यूपी में फिल्मों के जरिए शिक्षा की अलख जगाने वाला चल चित्र केंद्र बन गया कबाड़खाना

इलाहाबाद: यूपी में फिल्मों के जरिए शिक्षा की अलख जगाने वाला चल चित्र केंद्र  अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है. यहां रखे करोड़ों रुपये के उपकरण और वाहन कबाड़ में तब्दील हो रहे हैं. इस चल चित्र केंद्र ने हिंदी साहित्य के दिग्गज- सूर्यकांत त्रिपाठी (निराला), महादेवी वर्मा, मैथिली शरण गुप्त और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा पर लघु फिल्में बनाई थीं जो अब धूल खा रही हैं.

महात्मा गांधी मार्ग पर 1500 वर्ग मीटर क्षेत्र में स्थित इस परिसर में अंग्रेज सरकार द्वारा 1938 में शिक्षा प्रसार विभाग खोला गया था और वर्ष 1956 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डाक्टर संपूर्णानंद ने इस परिसर में चल चित्र केंद्र की स्थापना की थी. संपूर्णानंद अपनी विदेश यात्रा में शिक्षा के प्रसार में चल चित्र के इस्तेमाल से खासा प्रभावित हुए थे.

चल चित्र केंद्र के ध्वनि अभियंता रहे रामचंद्र पटेल ने बताया, इस परिसर में शूटिंग से लेकर प्रदर्शन तक की ऐसी सभी सुविधाएं मौजूद हैं जो एक टीवी एवं फिल्म प्रशिक्षण संस्थान के लिए जरूरी हैं. भारी संभावनाओं के बावजूद पूर्ववर्ती सरकारों के उपेक्षापूर्ण रवैये से यह केंद्र अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है. उन्होंने बताया कि इस केंद्र में फिल्म शूटिंग के लिए एक स्टूडियो, एक प्रिव्यू कक्ष, एक एडिटिंग कक्ष, एक लैब कक्ष, एक कैमरा कक्ष, एक फिल्म अनुरक्षण कक्ष, एक उपकरण अनुरक्षण कक्ष, एक भंडार कक्ष मौजूद है. फिल्म प्रिव्यू हॉल में 25-30 लोगों के बैठने की क्षमता है. वहीं प्रोजेक्टर से लैस 10-12 वाहन पिछले एक दशक से अधिक समय से पड़े पड़े कबाड़ का रूप ले रहे हैं.

दिलचस्प है कि इस परिसर में स्थित इमारतें, धरोहर इमारते हैं जिनका निर्माण सौ साल पूर्व कराया गया था और ये इनटैक की सूची में भी शामिल हैं. रामचंद्र पटेल का कहना है, शिक्षा विभाग के तहत आने वाले इस केंद्र को एक फिल्म प्रशिक्षण संस्थान में तब्दील करने का प्रस्ताव हमने पूर्ववर्ती सरकारों को दिया था, लेकिन फाइल कहीं न कहीं अटक गई. अब प्रदेश में योगी की सरकार है.. देखते हैं कि यह सरकार क्या रुख अपनाती है.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त प्रोफेसर एमसी चट्टोपाध्याय ने बताया, हमने 70 के दशक में फिल्म सोसाइटी बनाई थी और चल चित्र केंद्र से गठबंधन किया था. प्रख्यात पटकथा लेखक एवं फिल्म निर्माता बिमल दत्ता ने 1990 में इस चल चित्र केंद्र में पटकथा लेखन का कोर्स कराया था. हमने इस केंद्र को फिल्म प्रशिक्षण संस्थान में तब्दील कराने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया और राज्य सरकार के साथ काफी पत्राचार भी किया, लेकिन नतीजा सिफर रहा.

चट्टोपाध्याय ने बताया कि यद्यपि इस केंद्र में रखी मशीनें आज अप्रचलित हो गई हैं, लेकिन इनका ऐतिहासिक महत्व है और फिल्म प्रशिक्षण में विद्यार्थियों को इनसे यह सिखाया जा सकता है कि पुराने जमाने में फिल्में कैसे बनती थीं. यहां डोनाल्ड डक इन लैंड ऑफ मैथमैजिक जैसी दुर्लभ फिल्म की प्रिंट मौजूद रही है.

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