जर्मनी में भारतीय वैज्ञानिक के संघर्ष ने छेड़ी नई बहस

नई दिल्ली – जर्मनी में 12 साल बिताने वाली एक भारतीय पेशेवर की मार्मिक कहानी ने सोशल मीडिया पर “प्रवासी सपने”, मानसिक स्वास्थ्य और करियर बदलने के साहस को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। उद्यमी अंकुर वारिकू द्वारा साझा किए जाने के बाद वायरल हुई इस कहानी में, महिला ने जीव विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी (biotechnology) में अपने एक दशक लंबे सफर का वर्णन किया है। उनका मानना है कि उनकी मेहनत का “कोई फल नहीं मिला” और वे अकादमिक और पेशेवर कठोरता के बावजूद खुद को असफल महसूस कर रही हैं।

यह वृत्तांत उन भारतीय प्रवासियों के बीच बढ़ते रुझान को उजागर करता है, जो विदेशों में वर्षों के संघर्ष के बाद सफलता की पारंपरिक परिभाषाओं और उन स्थितियों में रहने की भावनात्मक कीमत पर सवाल उठाने लगे हैं जो अब उनके कल्याण में सहायक नहीं हैं।

वैज्ञानिक बनने की महत्वाकांक्षा से पेशेवर हताशा तक

यह महिला 23 साल की उम्र में वैज्ञानिक बनने के बचपन के सपने को लेकर जर्मनी गई थी। हालांकि, यूरोपीय जॉब मार्केट की वास्तविकता और एक विदेशी होने का अकेलापन चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। बेंगलुरु से निकलने से पहले जर्मन भाषा में दक्षता हासिल करने के बावजूद, उन्होंने “विषाक्त कार्यस्थलों” (toxic workplaces) का सामना किया, जहां उन्होंने खुद को “अत्यधिक काम, कम वेतन और मानसिक उत्पीड़न” का शिकार महसूस किया।

यह संकट 2023 में तब और गहरा गया जब उनकी मां को कैंसर का पता चला। अपने परिवार की देखभाल के लिए भारत में लंबे समय तक रुकने के बाद जब वह जर्मनी लौटीं, तो उनके नियोक्ता ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया—विडंबना यह है कि वह संस्था कैंसर इम्यूनोथेरेपी में विशेषज्ञता रखती थी।

अंकुर वारिकू को भेजे गए अपने ईमेल में उन्होंने लिखा, “मैं एक असफल व्यक्ति की तरह महसूस करती हूं क्योंकि मैं अपने बचपन के सपनों के पहले कदम तक पहुंचने में भी असमर्थ हूं। मैं जैसे-तैसे अपना गुजारा कर पा रही हूं। चाहे मैं कितने भी कौशल हासिल कर लूं, ऐसा लगता है कि मैं जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाऊंगी।”

‘विदेशी’ होने का बोझ

उनकी कहानी यूरोपीय संघ में भारतीय शोधकर्ताओं के सामने आने वाली विशिष्ट चुनौतियों पर प्रकाश डालती है। हालांकि जर्मनी ने हाल ही में वैश्विक प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए ‘अपॉर्चुनिटी कार्ड’ के माध्यम से आप्रवासन कानूनों में ढील दी है, लेकिन कई लोगों के लिए जमीनी हकीकत अभी भी नौकरशाही की बाधाओं और सांस्कृतिक सीमाओं से भरी हुई है।

जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र, हालांकि प्रतिष्ठित है, आईटी और फिनटेक क्षेत्रों की तुलना में धीमी वित्तीय वृद्धि और लंबे समय तक काम की मांग करता है। 12 वर्षों के बाद, उन्होंने महसूस किया कि वे अन्य क्षेत्रों के अपने साथियों की तुलना में काफी कम कमा रही हैं, जिससे उनकी पेशेवर स्थिरता की भावना और बढ़ गई।

अंकुर वारिकू की सलाह: ’80 की उम्र’ का नजरिया

वायरल पोस्ट का जवाब देते हुए, उद्यमी अंकुर वारिकू ने निर्णय लेने के लिए एक दार्शनिक ढांचा पेश किया। उन्होंने उन्हें अपने जीवन को 80 साल के व्यक्ति के नजरिए से देखने का आग्रह किया।

वारिकू ने लिखा, “आप यह नहीं कहना चाहेंगी कि ‘काश मैंने इस जीवन को उतनी देर तक सहन न किया होता जितना मैंने किया। काश मुझमें खुद की सुनने का साहस होता’।” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि “बर्बाद समय” का डर (संक-कॉस्ट फालेसी) अक्सर व्यक्तियों को खुशी पाने के लिए आवश्यक बदलाव करने से रोकता है।

विशेषज्ञ विश्लेषण: करियर बदलाव की नई परिभाषा

इस कहानी ने करियर कोचों और मनोवैज्ञानिकों को प्रभावित किया है, जिनका तर्क है कि भारतीय समाज में “हार मान लेने” को अक्सर गलत तरीके से परिभाषित किया जाता है।

मनोवैज्ञानिक पहलू पर टिप्पणी करते हुए, मुंबई स्थित करियर मनोवैज्ञानिक डॉ. स्नेहा शर्मा ने कहा: “भारत में, हमें यह मानने के लिए प्रेरित किया जाता है कि दृढ़ता ही एकमात्र गुण है। हम ‘हार न मानने’ को उस हद तक महिमामंडित करते हैं जहां यह आत्मघाती हो जाता है। यह मामला इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि हमें करियर बदलने (pivoting) को सामान्य बनाने की आवश्यकता क्यों है। एक ऐसे रास्ते को छोड़ने का चुनाव करना जो विषाक्त हो चुका है, असफलता नहीं है; यह अपने जीवन का एक रणनीतिक पुनर्मूल्यांकन है। 12 साल का अंतरराष्ट्रीय अनुभव ‘बेकार’ नहीं है—इसने लचीलापन और सांस्कृतिक समझ विकसित की है जिसे कहीं और लागू किया जा सकता है।”

सोशल मीडिया: प्रवासी अनुभव का आईना

नेटिज़न्स इस महिला के समर्थन में उतर आए हैं, और कई लोगों ने “रिवर्स ब्रेन ड्रेन” की ऐसी ही कहानियां साझा की हैं जहाँ पेशेवर जीवन की बेहतर गुणवत्ता और परिवार के करीब रहने के लिए भारत लौट रहे हैं। एक उपयोगकर्ता ने लिखा, “यदि 12 वर्षों के बाद मिट्टी ने फल नहीं दिया है, तो यह जमीन बदलने का समय है, अपने आत्म-सम्मान को कम करने का नहीं।”

यह चर्चा भारतीय मध्यम वर्ग की मानसिकता में बदलाव को दर्शाती है। जहां कभी विदेश जाना अंतिम उपलब्धि माना जाता था, अब बातचीत “समग्र सफलता” की ओर बढ़ रही है, जिसमें वित्तीय स्थिरता, मानसिक शांति और पारिवारिक समर्थन शामिल है।

आगे की राह

समान स्थितियों में फंसे कई लोगों के लिए, यह कहानी एक अनुस्मारक के रूप में कार्य करती है कि करियर जीवन का एक हिस्सा है, पूरा जीवन नहीं। चाहे वह यूरोप में रहना चुनें या भारत लौटना, विशेषज्ञों के बीच आम सहमति यह है कि हासिल किए गए कौशल—भाषा, तकनीकी विशेषज्ञता और अंतरराष्ट्रीय अनुभव—मूल्यवान संपत्ति बने रहेंगे, भले ही शुरुआती सपने का परिणाम कुछ भी रहा हो।

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